होली से पहले गन्ना किसानों को ऐतिहासिक राहत: 51.51 करोड़ का भुगतान, सहकारिता मॉडल को मिली नई मजबूती

Pushpraj Singh Thakur
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कवर्धा। होली से पहले गन्ना किसानों को मिली भुगतान की सौगात केवल एक आर्थिक राहत भर नहीं है, बल्कि यह सहकारी तंत्र में भरोसे की पुनर्स्थापना का संकेत भी है। भोरमदेव सहकारी शक्कर उत्पादक कारखाना, राम्हेपुर (कवर्धा) द्वारा ₹4.73 करोड़ की ताज़ा राशि जारी किया जाना और अब तक 14,518 किसानों को कुल ₹51.51 करोड़ का भुगतान किया जाना इस बात का प्रमाण है कि यदि इच्छाशक्ति और प्रशासनिक समन्वय हो तो सहकारिता मॉडल प्रभावी ढंग से कार्य कर सकता है।

उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा के विशेष प्रयासों और कलेक्टर गोपाल वर्मा के मार्गदर्शन में भुगतान की यह निरंतर प्रक्रिया क्षेत्र में सकारात्मक संदेश दे रही है। समयबद्ध भुगतान कृषि अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। किसान जब अपने उत्पाद का मूल्य समय पर प्राप्त करता है, तभी वह अगली फसल की तैयारी, परिवार के दायित्व और सामाजिक जरूरतों को संतुलित कर पाता है। ऐसे में यह पहल निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है।

चालू पेराई सत्र में अब तक 2,42,990 मीट्रिक टन गन्ने की पेराई और 2,86,743 क्विंटल शक्कर का उत्पादन केवल आंकड़े नहीं हैं; ये किसानों, प्रशासन और कारखाने की कार्यक्षमता के संयुक्त प्रयास का परिणाम हैं। यह उपलब्धि दर्शाती है कि यदि आपूर्ति श्रृंखला सुचारु रहे और प्रबंधन पारदर्शी हो, तो सहकारी संस्थाएं निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हैं।

हालांकि, इस सफलता के साथ एक गंभीर चेतावनी भी जुड़ी है। कारखाना प्रबंधन द्वारा अधिकतम गन्ना आपूर्ति सुनिश्चित करने की अपील केवल औपचारिक आग्रह नहीं है, बल्कि सहकारी ढांचे की स्थिरता का मूल आधार है। पंजीकृत उपविधियों की धारा 07(02)(घ) और 09(क)(05) का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि सदस्य किसानों के लिए नियमित आपूर्ति अनिवार्य है। यह प्रावधान दंडात्मक कम और अनुशासनात्मक अधिक है। सहकारिता की शक्ति सामूहिक जिम्मेदारी में निहित होती है; यदि सदस्य अपनी भूमिका से विमुख होते हैं तो संस्था की नींव कमजोर पड़ती है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि कारखाना केवल शक्कर उत्पादन तक सीमित नहीं है। FRP के अतिरिक्त रिकवरी राशि का भुगतान, शासन द्वारा प्रदत्त बोनस, रियायती दर पर शक्कर वितरण, उन्नत बीज की उपलब्धता और प्रशिक्षण कार्यक्रम—ये सभी कदम किसानों की समग्र उन्नति की दिशा में उठाए गए हैं। परिसर में बलराम सदन और ₹5 में गरम भोजन की सुविधा सामाजिक उत्तरदायित्व की मिसाल पेश करती है। इससे स्पष्ट होता है कि कारखाना स्वयं को केवल एक औद्योगिक इकाई नहीं, बल्कि सामाजिक संस्थान के रूप में स्थापित करना चाहता है।

फिर भी सबसे बड़ा प्रश्न भविष्य की स्थिरता का है। यदि पेराई लक्ष्य समय पर पूरा नहीं होता, तो कारखाने का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है। ऐसे में किसानों की सक्रिय सहभागिता अनिवार्य हो जाती है। सहकारी संस्थाएं तभी सफल होती हैं जब सदस्य उन्हें अपनी संस्था मानकर योगदान दें, न कि केवल भुगतान प्राप्त करने का माध्यम समझें।

सरकार और प्रशासन की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि भुगतान की वर्तमान गति बनी रहे, पारदर्शिता कायम रहे और किसी प्रकार की देरी या अव्यवस्था से किसानों का विश्वास आहत न हो। साथ ही, दीर्घकालिक योजना बनाकर उत्पादन, विपणन और मूल्य संवर्धन की दिशा में भी ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।

होली के अवसर पर मिली यह आर्थिक सौगात निश्चित रूप से उत्साहवर्धक है, परंतु इसे स्थायी उपलब्धि में बदलने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। सहकारिता का सशक्त मॉडल ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थायित्व और किसानों को सम्मानजनक जीवन दे सकता है। अब समय है कि किसान, प्रबंधन और प्रशासन—तीनों मिलकर इस विश्वास की डोर को और मजबूत करें।

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आप सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं एवं वर्तमान में India News के जिला ब्यूरोचीफ के रूप में काम कर रहे हैं। आप सॉफ्टवेयर डेवलपर एवं डिजाइनर भी हैं।

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