कृषि प्रधान देश कहे जाने वाले भारत में यदि किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं, तो यह केवल एक सामाजिक त्रासदी नहीं, बल्कि नीतिगत विफलताओं का गंभीर संकेत है। राज्यसभा सांसद फूलोदेवी नेताम द्वारा संसद में विशेष उल्लेख के माध्यम से छत्तीसगढ़ के किसानों की आत्महत्या का मुद्दा उठाया जाना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह विषय केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा से जुड़ा है, जिनकी आजीविका और आशाएं एक साथ समाप्त हो जाती हैं।
किसानों की आत्महत्या के पीछे आर्थिक संकट प्रमुख कारण के रूप में सामने आता है। खेती के लिए किसान बैंकों और साहूकारों से कर्ज लेते हैं। प्राकृतिक आपदा, फसल खराबी या बाजार में उचित मूल्य न मिलने की स्थिति में वे कर्ज चुका नहीं पाते। कर्ज का बोझ और सामाजिक दबाव उन्हें ऐसे कदम उठाने पर मजबूर कर देता है, जो किसी भी संवेदनशील समाज के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में एक और गंभीर समस्या उजागर हुई है—धान खरीदी में टोकन व्यवस्था की अव्यवस्था। जब किसान अपनी उपज लेकर खरीद केंद्रों तक पहुंचता है और उसे कई दिनों तक टोकन नहीं मिलता, तो उसकी मेहनत और उम्मीद दोनों पर चोट लगती है। खरीदी बंद हो जाने की स्थिति में उसे अपनी उपज औने-पौने दाम पर बाजार में बेचनी पड़ती है। इससे वह और गहरे कर्ज में डूब जाता है। महासमुंद, कोरबा, मोहला-मानपुर और जांजगीर-चांपा जैसे जिलों में सामने आए मामलों ने इस समस्या की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है।
यह स्थिति केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है, जो किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य और समय पर खरीदी का आश्वासन देने में असफल रही है। यदि टोकन वितरण और खरीदी की प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध और जवाबदेह हो, तो ऐसी नौबत शायद न आए।
फूलोदेवी नेताम की यह मांग कि आत्महत्या करने वाले किसानों का पूरा कर्ज माफ किया जाए और पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया जाए, मानवीय दृष्टि से उचित प्रतीत होती है। परंतु इसके साथ-साथ आवश्यक है कि दीर्घकालिक समाधान पर भी गंभीरता से काम हो। खरीदी व्यवस्था को अंतिम किसान तक पहुंचाना, तकनीकी माध्यमों से टोकन प्रणाली को पारदर्शी बनाना, फसल बीमा को प्रभावी करना और किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करना—ये कदम केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि प्राथमिकता बनने चाहिए।
किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि उनकी पीड़ा संसद में उठ रही है, तो यह लोकतंत्र की जीवंतता का संकेत है। अब आवश्यकता है कि यह आवाज नीति और व्यवस्था में ठोस परिवर्तन का कारण बने। क्योंकि जब तक खेतों में उम्मीद जिंदा है, तभी तक देश की समृद्धि संभव है।


