रायपुर। पंडरिया क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहीं विधायक भावना बोहरा द्वारा विधानसभा में उठाए गए प्रश्न केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति को भी उजागर करते हैं। शासकीय विद्यालयों की बदहाल स्थिति, छात्राओं के लिए मूलभूत सुविधाओं का अभाव और शिक्षकों की कमी जैसे मुद्दे वर्षों से चर्चा में रहे हैं, लेकिन समाधान की गति अब भी अपेक्षाकृत धीमी दिखाई देती है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि पंडरिया विधानसभा क्षेत्र में बड़ी संख्या में विद्यालय अब भी शौचालय जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित हैं। कवर्धा, सहसपुर-लोहरा और पंडरिया विकासखंडों में चिन्हित किए गए विद्यालयों की संख्या यह स्पष्ट करती है कि जमीनी स्तर पर योजनाओं का क्रियान्वयन अभी भी अधूरा है। विशेष रूप से छात्राओं और महिला स्टाफ के लिए यह स्थिति न केवल असुविधाजनक है, बल्कि शिक्षा के अधिकार और गरिमा से भी जुड़ा विषय है।
इससे भी अधिक गंभीर पहलू यह सामने आया कि शासकीय विद्यालयों के भवनों की स्थिति को लेकर किसी प्रकार का व्यापक सर्वेक्षण ही नहीं कराया गया है। जब वास्तविक स्थिति का आकलन ही नहीं होगा, तो सुधार की योजनाएं कितनी प्रभावी होंगी, यह स्वयं एक बड़ा प्रश्न है। भवनविहीन, जर्जर और अतिजर्जर स्कूलों में पढ़ाई कर रहे बच्चों के भविष्य को लेकर शासन-प्रशासन की प्राथमिकताएं स्पष्ट होनी चाहिए।
वहीं, परंपरागत एवं कुटीर उद्योगों के संदर्भ में सरकार का उत्तर यह संकेत देता है कि योजनाएं तो अनेक हैं, परंतु उनका प्रभाव सीमित दायरे में सिमटा हुआ है। कबीरधाम जिले में पंजीकृत बुनकर, रेशम समूह और कुम्हारों की संख्या अत्यंत कम है, जो यह दर्शाती है कि इन योजनाओं का व्यापक लाभ कारीगरों तक नहीं पहुंच पा रहा है। दो वर्षों में मात्र 65 हजार रुपये का व्यय भी इस क्षेत्र में अपेक्षित निवेश और प्रोत्साहन की कमी को उजागर करता है।
एकल शिक्षकीय विद्यालयों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। सीमित शिक्षकों के भरोसे संचालित विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता पर स्वाभाविक रूप से प्रभाव पड़ता है। वहीं 276 विद्यालयों का युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया से प्रभावित होना यह संकेत देता है कि शिक्षा व्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव किए जा रहे हैं, जिनका असर दूरगामी हो सकता है—परंतु इसके परिणामों का मूल्यांकन भी उतना ही आवश्यक है।
इन सभी तथ्यों के बीच यह स्पष्ट है कि शिक्षा और रोजगार जैसे मूलभूत विषयों पर अब केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन और निरंतर निगरानी की आवश्यकता है। विधायक द्वारा उठाए गए ये प्रश्न सरकार के लिए एक अवसर हैं – व्यवस्था की कमियों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने का।
अंततः, यदि प्रदेश को सशक्त बनाना है तो शिक्षा और पारंपरिक आजीविका दोनों को समान प्राथमिकता देनी होगी। केवल आंकड़ों और उत्तरों से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई ही वास्तविक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।



