कवर्धा। पंडरिया विधानसभा क्षेत्र के कुल्हीडोंगरी गांव में आयोजित कार्यक्रम केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि वह सांस्कृतिक स्वाभिमान, सामाजिक पुनर्संरचना और राजनीतिक संदेश का संगम बनकर सामने आया। लगभग 165 आदिवासी नागरिकों द्वारा अपने मूल धर्म में वापसी और विधायक भावना बोहरा द्वारा उनके पैर पखारकर सम्मान करने की घटना ने पूरे क्षेत्र में एक व्यापक विमर्श को जन्म दिया है।
वनांचल क्षेत्रों में लंबे समय से पहचान, परंपरा और विकास का प्रश्न समानांतर रूप से चलता रहा है। ऐसे में इस प्रकार का आयोजन केवल आस्था की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। विधायक बोहरा ने इसे सामाजिक एकता और आत्मगौरव से जुड़ा अभियान बताया है। उनके अनुसार, विकास कार्यों, योजनाओं के क्रियान्वयन और निरंतर संवाद के माध्यम से जनजातीय समाज का विश्वास मजबूत हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप लोग अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौट रहे हैं।
इससे पूर्व भी नेऊर, कुई-कुकदुर और दमगढ़ क्षेत्रों में घर वापसी के कार्यक्रम आयोजित हुए हैं। आंकड़ों के अनुसार, अब तक 400 से अधिक आदिवासी नागरिक पुनः अपने मूल धर्म से जुड़े हैं। यह संख्या केवल सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन का संकेत मानी जा रही है, जिसे भाजपा नेतृत्व सांस्कृतिक संरक्षण और विकास के संयुक्त परिणाम के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
राज्य स्तर पर भी यह विषय राजनीतिक और वैचारिक रूप से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। विधायक ने संकेत दिया है कि आगामी बजट सत्र में छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 लाया जाएगा, जिसका उद्देश्य प्रलोभन, दबाव या छलपूर्वक धर्म परिवर्तन पर रोक लगाना बताया जा रहा है। यह स्पष्ट है कि सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न अब केवल सामाजिक नहीं, बल्कि विधायी विमर्श का भी हिस्सा बनने जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में “डबल इंजन” सरकार के विकास मॉडल को भी इस अभियान से जोड़ा जा रहा है। वनांचल क्षेत्रों में सड़क, आवास, स्वास्थ्य, एम्बुलेंस सेवा, मोबाइल हेल्थ पैथ लैब, शिक्षा और रोजगार के अवसरों का विस्तार इस बदलाव की पृष्ठभूमि के रूप में रेखांकित किया गया है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पक्ष भी है धर्म, संस्कृति और राजनीति के अंतर्संबंधों को लेकर समाज में अलग-अलग मत स्वाभाविक हैं। एक ओर इसे सांस्कृतिक आत्मविश्वास की वापसी कहा जा रहा है, तो दूसरी ओर यह बहस भी उठ रही है कि विकास और आस्था के प्रश्नों को किस प्रकार संतुलित किया जाए।
कुल्हीडोंगरी का यह आयोजन निश्चित ही प्रतीकात्मक रूप से बड़ा संदेश देता है कि वनांचल का समाज अपनी पहचान को लेकर सजग है और विकास की मुख्यधारा से जुड़ना चाहता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि यह पहल सामाजिक समरसता को किस हद तक मजबूत करती है और विधायी स्तर पर प्रस्तावित कदम किस प्रकार व्यापक सहमति का आधार बन पाते हैं।
स्पष्ट है कि पंडरिया में हुई यह घर वापसी केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आने वाले समय की सामाजिक और राजनीतिक दिशा का संकेत भी है।


