कबीरधाम जिले में धान खरीदी केंद्रों से जुड़े लगभग 25 करोड़ रुपये के कथित धान शॉर्टेज के मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह केवल सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किसी वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं है, बल्कि उन हजारों किसानों की मेहनत और विश्वास से जुड़ा विषय है, जिन्होंने अपनी उपज शासन की खरीदी व्यवस्था के भरोसे सौंपी थी।
जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नवीन जायसवाल द्वारा विभिन्न धान खरीदी केंद्रों के निरीक्षण के दौरान खेरझिटी नया, दुल्लापुर, कोदवा गोंडान और कुकदूर केंद्रों में बड़ी मात्रा में धान की कमी पाए जाने का दावा किया गया है। यदि यह दावा सही है तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि रिकॉर्ड में दर्ज हजारों क्विंटल धान आखिर कहां गया और इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
इस मामले में सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि कथित तौर पर अधिकारियों को शॉर्टेज को शून्य करने के निर्देश दिए जाने की चर्चा सामने आ रही है। ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि प्रशासन का उद्देश्य वास्तविक स्थिति की निष्पक्ष जांच करना है या केवल आंकड़ों को संतुलित दिखाना। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में समस्या को छिपाने के बजाय उसके मूल कारणों तक पहुंचना अधिक आवश्यक होता है।
धान खरीदी और भंडारण से जुड़े मामलों में पूर्व में भी अनियमितताओं के आरोप सामने आते रहे हैं। यदि बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं तो यह केवल व्यक्तिगत लापरवाही का मामला नहीं माना जा सकता, बल्कि पूरी निगरानी और जवाबदेही व्यवस्था की समीक्षा की आवश्यकता है। किसानों की उपज से जुड़ी किसी भी प्रकार की गड़बड़ी सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और शासन के प्रति जनता के विश्वास को प्रभावित करती है।
यह भी विचारणीय है कि यदि प्रशासन को इस कमी की जानकारी नहीं थी तो यह गंभीर प्रशासनिक विफलता है, और यदि जानकारी थी तो समय रहते प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की गई। ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय होना उतना ही आवश्यक है जितना कि शॉर्टेज के वास्तविक कारणों का पता लगाना।
अब आवश्यकता इस बात की है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए। जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए ताकि किसानों और आम जनता के मन में उठ रहे सवालों का जवाब मिल सके। दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों पर कठोर कार्रवाई होना भी उतना ही जरूरी है, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
कबीरधाम के किसानों और आम नागरिकों का सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है—यदि रिकॉर्ड में धान दर्ज है तो वह धान आखिर कहां गया? जब तक इस प्रश्न का स्पष्ट और तथ्यात्मक उत्तर सामने नहीं आता, तब तक 25 करोड़ रुपये के धान शॉर्टेज का मामला जिले में चर्चा और चिंता का विषय बना रहेगा।


