कवर्धा|ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली धुरी किसान है, और किसान की मजबूती का सबसे बड़ा आधार है-समय पर भुगतान। ऐसे में वैवाहिक सीजन के बीच गन्ना किसानों को ₹13.80 करोड़ की राशि जारी होना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन और जवाबदेह व्यवस्था का प्रमाण है। उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा के प्रयासों से हुआ यह भुगतान उस भरोसे को और गहरा करता है, जिसकी अपेक्षा लंबे समय से सहकारी संस्थाओं से की जाती रही है।
चालू पेराई सत्र में ₹71.29 करोड़ का कुल भुगतान यह स्पष्ट करता है कि भोरमदेव सहकारी शक्कर उत्पादक कारखाना अब केवल उत्पादन केंद्र नहीं, बल्कि भरोसे का संस्थान बन चुका है। कलेक्टर एवं प्राधिकृत अधिकारी गोपाल वर्मा के मार्गदर्शन में जिस प्रकार भुगतान प्रक्रिया को निरंतर और समयबद्ध रखा गया है, वह प्रशासनिक दक्षता का सशक्त उदाहरण है।
भुगतान से आगे की सोच: विकास का समग्र मॉडल यह पहल केवल बकाया राशि चुकाने तक सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यापक ग्रामीण विकास मॉडल को दर्शाती है। एफआरपी से अधिक भुगतान, बोनस वितरण और किसानों को रियायती दर पर शक्कर उपलब्ध कराना यह साबित करता है कि यहां किसान को ‘लाभार्थी’ नहीं, बल्कि ‘भागीदार’ माना जा रहा है।
इसके साथ ही उन्नत बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम यह संकेत देते हैं कि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की क्षमता निर्माण पर भी समान ध्यान दिया जा रहा है। “बलराम सदन” और ₹5 में भोजन जैसी सुविधाएं इस सहकारी मॉडल को मानवीय संवेदनाओं से भी जोड़ती हैं।
उत्पादन के आंकड़े: प्रबंधन की दक्षता का प्रमाण 2,55,818 मीट्रिक टन गन्ना पेराई और 3,09,120 क्विंटल शक्कर उत्पादन यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि जब नीति, प्रबंधन और किसान एक दिशा में कार्य करते हैं, तो परिणाम स्वतः ही उत्कृष्ट होते हैं। यह उपलब्धि न केवल कारखाने की क्षमता को दर्शाती है, बल्कि किसानों की सक्रिय भागीदारी और विश्वास का भी प्रतीक है
समय पर भुगतान का सीधा असर स्थानीय बाजारों में दिखाई देता है। किसानों के हाथ में नकदी आने से व्यापार, सेवा और छोटे उद्योगों में नई जान आती है। गन्ने को धान के विकल्प के रूप में बढ़ावा देना कृषि विविधीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जो भविष्य में जल संरक्षण और आय वृद्धि दोनों के लिए लाभकारी साबित हो सकता है।
भोरमदेव शक्कर कारखाना आज उस बदलते हुए सहकारी मॉडल की तस्वीर पेश कर रहा है, जहां पारदर्शिता, समयबद्धता और किसान-केंद्रित सोच के साथ विकास को नई दिशा दी जा रही है। यह पहल केवल कवर्धा जिले तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि प्रदेश और देश की अन्य सहकारी संस्थाओं के लिए भी प्रेरणा बन सकती है।
समय पर भुगतान की यह पहल बताती है कि यदि नीयत स्पष्ट हो और प्रबंधन मजबूत, तो सहकारिता केवल व्यवस्था नहीं, बल्कि बदलाव का प्रभावी माध्यम बन सकती है।



